क़ातिल से मोहब्बत     


Poems : Self Flows11-Jan-2020


डरते डरते, वक़्त कुछ यूं आया, काफ़ूर दिल से हुआ सारा डर |
हमें क़ातिल से हो गयी मोहब्बत, फ़ूल झरेंगे, जब घुसेगा ख़ंजर ||

सुना है इंतहा से आगे है, इंतहा की भी इंतहा |
दिमाग़ हो दोनों तरफ़, तब तो हो जिरह की इंतहा ||

जब लाइन लगी थी वहां पर, सब तुम्हें ही तो गया था मिल |
जाओ हमसे ये भी ले लो, हमें जो मिला था थोड़ा सा दिल ||

आज थोड़ा जल्दी निकलता हूँ, अल्फाज़ जल्दी ही लगेंगे चुभने |
इलाक़ा था वो कोई और, जहाँ पर लोग लगे थे सुनने ||

आँख, कान सब देख सुन के, अब पड़ चुके हैं सुन्न |
रहने लगे हैं चोर घरों में, चौकीदार हैं पूरे टुन्न ||

क़ातिल से मोहब्बत करके, अब जुर्म में मैं भी शामिल |
क़यामत पर देखेंगे, क्या उनको हासिल, क्या मुझको हासिल ||

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