दरख़्त -ए-ज़हर     


Poems : Shayari27-Jan-2020


अगर तुम बोओगे ज़हर के बीज ,
फिर वैसा ही निकलेगा दरख़्त |
कभी देखा है तुमने कभी,
कि मुआफ़ कर देता हो वक़्त ||

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