तुम खुद ही फसोंगे     


Poems : Self Flows27-Jan-2020


मुझे अब कबीर न आता याद ,
रुंध गया गला, चुप गयी फरियाद |
सुना तो गया था मेरा पूरा वाद,
मैं बाहर भी हूँ, मगर न आज़ाद ||

देता पहले भी न था, अब मांगता भी नहीं,
इज़्ज़त की बात करें, इज़ाज़त ही नहीं |
चुप रहकर बोलना सीख रहे हैं आजकल,
सब चंगा है जी, शिकायत ही नहीं ||

डर से डर नहीं मोहब्बत हो गयी,
खोपड़ी अपनी है गश खाने लगी |
हमारी समझ बड़ी हो या छोटी,
तुमसे रहेगी छोटी, ये बात समझ आने लगी |

मैंने हथियार डालें हैं, कहीं ये न समझना,
बस ख़ुद को उसके हवाले कर दिया फ़िलहाल |
नहीं तुमको दी है दुआ या बद्दुआ,
तुम खुद ही फसोंगे, बिछा कर अपना जाल ||

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