जनता कर्फ्यू     


Poems : Self Flows22-Mar-2020


सुबह अलसाये उठे, दोपहर तक देखते रहे टीवी,
जिज्ञासा बढ़ी दरवाजे पर आकर हुए खड़े |
हाँ आज बदली बदली थीं आवाजें सारी,
चहकती थी चिड़ियाँ, पेड़ कुछ थे ज़्यादा तने खड़े ||

आज आदमी मनाता था नाम रखकर जनता कर्फ्यू,
और प्रकृति ने आदमी के शोर से पायी थी निजात |
हम चाहते थे मुक्ति एक अनजाने वायरस से,
प्रकृति समझती थी कि कोई वायरस हुआ है शांत |

आज गमलों पर भी ढेर आईं हैं तितलियाँ,
गूंजाते भ्रमर कुछ समझाना सा चाहते हैं |
साम, दाम, दण्ड से सीख लो सबक तो अच्छा,
वरना भेद अंतिम मंजिल है, यही भेद की बातें हैं ||

– सुनील जी गर्ग

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