मुझमें उम्मीद उनसे थोड़ी ज़्यादा है     


Poems : Self Flows28-Mar-2020


बैटरी पड़ गयी है मंद, सुस्त हो गयी है घड़ी,
वैसे भी अब वक़्त अब देखना किसको है |
ज़िन्दगी की यही रफ़्तार लगने लगी है अच्छी,
कौन मुझसे आगे दौड़ेगा देखना मुझको है ||

दौड़े दौड़े से भागे से आगे फिरते थे मुझसे वो,
मेरा मज़ाक बनाने में मज़ा आता था उनको |
आज मेरी ज़िन्दगी से रश्क़ करते थमते नहीं,
वक़्त की करवट का पहले न पता था उनको ||

वैसे ग़म और ख़ुशी का भेद भूलते जा रहे हैं वो भी,
खुद को सन्यासी बताने में अब गुरेज नहीं |
मगर मुझमें उम्मीद उनसे थोड़ी ज़्यादा है ,
ये पक्का है, बाहर की रौशनी भीतर से तेज नहीं ||

सजा सबको बराबर मिलेगी, नियति का यही है फ़ैसला,
मगर अलग अलग है सबकी सहने की शक्ति |
क़ुसूर किसके ज़्यादा हैं किसके हैं दूसरे से कम,
फैसले से फ़रक न पड़े शायद, अब हो गयी विरक्ति ||

Tags: ,

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of
|