अरे कुछ दिन जरा रुका     


Poems : Self Flows16-May-2020


ऐतिहासिक श्रमिक निवर्तन पर कुछ पंक्तियाँ एक वार्तालाप के रूप में लिखीं हैं, आशा है आपको कहीं छूएंगी अवश्य |

अरे कुछ दिन जरा रुका
सब ठीक हो जाईल, फिर कमायेंगे
तोहार बात सब ठीक
पर भैया हम तो घर जायेंगे ।

उहाँ का धरा है
बंजर ही तो जमीन पड़ी है
हम तोहार समुझाइ न सकत
मैया बाट जोहती द्वारे खड़ी है ।

अरे। फैक्ट्री खुलन लागी हैं
डबल मिलेगा ओवरटाइम
ओवर फोवर क्या करिबे
जब ई शरीर का आवेगा टाइम

पर भैया पैदल काहे चलिबै
बस चलत है, चालू है टिरेन
इब हमरे खन कछु नहीं
मूढ़ पिरात है, खाओ न बिरेन ।

पर तुम चले जाब तो,
कइसे चलिबा हमरा काम
जोन हम भूखो पड़ो रहे
तब कौन लियो हमरो नाम |

पर भैया अब तो पैकेज आई गवा
तुम्हरे सबे दुःख दूर भवेंगे
हमको कोनो दुःख नाहीं भैया
घर जावेंगे, अब हम वहीँ खटेंगे |

मगर सरकार तो भली है,
सबकी कर रही है पूरी मदत
सरकार सबे भली ही होत हैं,
जबे वोट परिबे, देखिबे वाए बखत |

मगर ओ मुसीबत के मारों
चना, अनाज तो लेत जाबा
जो हमने उगाया, हमें बाँटते हो
गाँव आकर ये सब हमसे लई जाबा |

इधर पइसा ज़्यादा है, सबे है पता
इसी शहर ने तोको इंसान है बनाया
शहर वालों की मुहब्बत के मारे हैं हम
मेहनतकश को काहे भिखारी बनाया |

अब कइसे करोगे जरा समुझाओ
कइसन तोहार दिवस बहुरेंगे
अब तुम आवोगे हमरे गावंन में
उहें मिलकर सबे आतम निर्भर बनेंगे |

सुनील गरगवा जी

(आज मज़दूर की भाषा में भी कई प्रदेशों की आंचलिक भाषा का मिक्स होइ गवा है, इसीलिए इस रचना को कृपया आंचलिक भाषा के स्तर पर त्रुटिपूर्ण मानते हुए माफ़ी देवें)

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