भारत की स्वतंत्रता की हीरक जयंती

15-Aug-2022

देश अनोखा दुनिया में ये
इंडिया, भारत, हिंदुस्तान
तुलना करके देख ले कोई
सबसे ज़्यादा यहाँ सम्मान

वेद, उपनिषद यहाँ की थाती
व्यास, शंकराचार्य से विद्वान
भगवद्गीता के परम उपदेश
विवेकानंद ने बिखेरा ज्ञान

चरक, सुश्रुत सम चिकित्सक
पतंजलि का है योग महान
रामानुज और आर्यभट्ट ने
सदियों पहले दिया विज्ञान

ये देश निरंतर रहा अग्रसर
यहाँ आये मुग़ल या वो अंग्रेज
शिवाजी, प्रताप या वीर सुभाष
लक्ष्मीबाई ने दिखलाया तेज

एक ही गाँधी, एक ही पटेल
नेहरु, अम्बेडकर एक ही थे
आज़ादी के नायक सब थे
हर जन मानस यहाँ एक ही थे

आज़ादी आई आधी रात
पंद्रह अगस्त सैंतालिस को
तब से खूब तरक्की कर ली
समझा कंप्यूटर की बिट्स को

ऐसे गुजरे साल पचहत्तर
देश निरंतर हुआ जवान
मसले सारे हल हो चले अब
पा गए अपना घर भगवान्

अब नयी मंजिलें दिखती हैं
यहाँ के युवा मतवालों को
चाँद पर लेकर जायेंगे ये
अब अपने भारत वालों को

कोई हम पर शक न करना
कोई आँख दिखाना न
शान्त हैं हम कमजोर नहीं
सीमा पर हमारी आना न

आज हमारा सीना चौड़ा
गर्व से फ़हराया है तिरंगा
आशीर्वाद प्रकृति देती है
पिता हिमालय और माँ गंगा

भारत की स्वतंत्रता की हीरक जयंती पर सबको शुभकामनायें

– सुनील जी गर्ग

हिंदी में मन मिलाते हैं हम

14-Sep-2020

हिंदी को समर्पित एक कविता

हिंदी ही समेटे है हिंदुस्तान
इसी में मन मिलाते हैं हम
मस्तिष्क की कुंजी है ये ही
इसी में सोचकर भुलाते हैं गम

हम थोड़ा कम पढ़ने लगे हों इसको
पर दुनिया में इसको सीखने की चाह
इतना साहित्य भरा पड़ा है इसमें
और फिल्में इसमें तो बस भई वाह

इसका संगीत से भी है पुराना नाता
इसमें लिखे गाने है बच्चा बच्चा गाता
कविता की तुक इसमें अच्छी है मिलती
प्रेमी छेड़े राग तो प्रेयसी को भाता

पर जब इसका दिवस मनाते हैं
तो जरा मन को कुछ अखरता है
दैनिक काम का इक दिवस कैसा
प्रश्न ये खुद से दिल करता है

ठीक है माँ के जन्मदिन की तरह
ये आज का दिन भी लेते हैं मना
हर मौलिक विचार की जननी है यही
जीवन का हर पहलू इसी से है बना

हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई

– सुनील जी गर्ग

पर्यावरण दिवस २०२०

05-Jun-2020

पर्यावरण दिवस की शुभकामनायों के साथ प्रस्तुत हैं ये चंद पंक्तियाँ

कह लो इसको प्रकृति
या कह लो पर्यावरण
पर ध्यान ज़रा सा रख लो बंधु
रोक लो इसका शीघ्र क्षरण 

जल, जंगल, ज़मीन का दोहन
नहीं रोका तो तय है विनाश
फिर बाद में यूँ कहते फिरोगे
समय रहते कुछ किया होता काश

अभी हाल की घटनाओं ने 
काफी कुछ तो सिखलाया है
प्रकृति ही असली माँ है हमारी
यही सभी को बतलाया है 

वही इसी को देना होगा
जो माँ को तुम देते सम्मान
नहीं ज़रा इक दिवस मनाकर
रोज़ ही रखना होगा ध्यान

पेड़ लगाओ, पानी बचाओ
सब अच्छा है करते रहो
रखरखाव पर सबसे ज़रूरी
घट इक ये भी तो भरते रहो

थोड़ी सी इससे लग तो लगा लो
ये प्रेम बढ़ाता है पर्यावरण
प्रकृति फिर निखरकर आती
सारे अपने उतारकर आवरण

सुनील जी गर्ग

वैलेंटाइन दिवस 2020

13-Feb-2020

बहुतों ने इसे रोकना चाहा,
पर बढ़ता रहा इसका प्रचार |
दिलवाले देश में कम न थे,
यूँ मनाते रहे जैसे त्यौहार ||

कोई घर में चुपचाप मनाता,
कोई करता है इसकी नुमाईश |
कोई बिना बोले रह जाता,
कोई पूरी करता फ़रमाइश ||

इसी देश में खजुराहो और,
इसी देश में घूंघट है |
इसी देश में अब भी शादी में,
माँ बाप की हाँ की ज़रुरत है ||

प्रेम दिवस यहाँ सदियों से,
असली संतों का देश है ये |
यहाँ प्रेम भी है एक योग समान,
दुनिया को एक सन्देश है ये ||

नोट:
वैलेंटाइन दिवस मनाने वाले उत्साह से मनाएं, ये कविता उन्हें निराश करने के लिए नहीं, पर एक भारतीय होने के कारण हर दिवस प्रेम दिवस के रूप में मनाने के लिए प्रेरणा देने के लिए है| प्रकृति से प्रेम के लिए, मानवता से प्रेम के लिए, देश से प्रेम के लिए, काम से प्रेम के लिए, परिवार से प्रेम के लिए, मित्रों से प्रेम के लिए व स्वयं से प्रेम के लिए |

सबको शुभ हो

2020, फरक पड़ेगा उन्नीस बीस

01-Jan-2020

उन्नीस से आया है बीस,
फरक पड़ेगा उन्नीस बीस |
ले भागा कोई बड़ा सा टुकड़ा,
किसी को मिलता छोटा पीस ||

किस्मत के भी नियम निराले,
प्यास जहां न, भरे हैं प्याले |
आ सकता है काम किसी के,
क्यूँ बंद तिजोरी, लगे हैं ताले ||

क्या इस साल कुछ बदलेगा,
दाता कुछ उनको भी देगा |
घुटनों पर भी चल न पाते,
क्या वो उनको गोदी लेगा ||

हमारा क्या हमें तो तर्क आता है,
देना है या नहीं फर्क आता है |
हर साल नयी इच्छा, नए वादे,
निभाया फ़र्ज़ जाता है ||

इस बार कविता में वो शुभता नहीं है,
जश्न मना लो तो सच चुभता नहीं है|
सबको रहने दो चैन से यहाँ पर,
बिना सबके ये देश जंचता नहीं है ||

नव वर्ष पर आओ पुरानी
वापिस लाएं आदत |
संग रहें इक दूजे के,
सबने दी है शहादत ||

समझ समझ के समझ समझना,
मट्टी करना कहा सुना |
नया कहेंगे, नया सुनेंगे,
प्यार बढ़ जाये कई गुना ||

हमारी भी जय जय, तुम्हारी भी जय जय,
हमें भी मुबारक, तुम्हें भी मुबारक |
मानवता का कार्ड बनावें,
हो जाएँ सब उसके धारक ||

नव वर्ष मंगलमय हो

डिस्क्लेमर :
इस काव्य सन्देश का किसी देश, धर्म, जाति से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है. अगर ऐसा लगता है तो इसे मात्रा एक संयोग ही कहा जायेगा |

2020, बुध का शुरू भी करेगा मंगल

31-Dec-2019

मंगल से शुरू था पिछला साल,
बुध का शुरू भी करेगा मंगल |
अगर करो तुम वादा खुद से,
सेव करोगे जल और जंगल ||

और करो कुछ अच्छी बातें,
वाणी से नहीं व्यवहार से |
उनको भी सम्मान दिला दो,
जो आया हो बाहर से ||

मगर काम भी लाना होगा,
तभी तो संग में सुख से जियेंगे|
काहे को फिर होगी फ़ुरसत,
काहे को बेकार लड़ेंगे ||

आओ मिलकर पढ़ें पढ़ावें,
बच्चों को रोज़गार दिलावें |
राजनीति पीछे छूटेगी,
अर्थ नीति पर दाँव लगावें ||

वक़्त बदलते को पहचानें,
हुनर को इज़्ज़त पूरी ज़रूरी |
आदत पर कुछ रखें नियंत्रण,
साफ़ सफ़ाई रखें पूरी ||

फिर वो बीता वक़्त आयेगा,
जिसपर करता हर कोई नाज़ |
सोने की चिड़िया वो अपनी,
उड़ पाएगी ऊंचा आज ||

इस बधाई को रस्म न समझना,
दिल की हूक बड़ी सच्ची है |
एक फ़कीरी है हममें भी,
आपके दिल को लगे तो अच्छी है ||

नए वर्ष पर आप सब उन्नति के नए शिखर छुएँ, ऐसी हार्दिक कामना है|

सुनील जी गर्ग

स्वतंत्रता दिवस 2018

15-Aug-2018

आधी रात मिली आज़ादी,
फिर सुबह हुई हसीन |
उचंग बढ़ी मन में सबके,
सब खुशियों में तल्लीन ||

बंधन सारे टूट गए,
चले गए फिरंगी |
नयी सुबह तो हुई,
मगर माहौल बड़ा अब भी जंगी ||

जंग बड़ी थी अब आगे,
हर मुंह को निवाला देना था |
रहने को छत देनी थी,
हर तन को झिंगोला देना था ||

फूँक के हर रखना था कदम,
अधिकार बराबर देने थे |
छूट गए थे पीछे लोग ,
साथ सभी वो लेने थे ||

इसीलिए सोचा और लिखा,
दो वर्षो तक एक ग्रन्थ महान |
समरस, समभाव था जिसमें पूरा,
नाम था जिसका सविंधान ||

फिर होती गयी प्रगति,
सरकारें आयीं और चली गयीं |
पर जाने क्यों जन मानस को,
संतुष्टि उतनी मिली नहीं ||

कुछ को निवाले मिले,
कुछ के निवाले छिन भी गए |
कुछ के बने महल तो
कुछ के दिवाले निकल गए ||

कुछ की बची लाज,
तो कईयों की लुट भी गयी |
कुछ को मिली साँस
तो कईयों की घुट भी गयी ||

हम रहे पीटते ढोल,
कईयों की चीख़ दबाने को |
धर्म, जाति को उपर लाये,
जरूरतें छिपाने को ||

आज़ादी के नाम पर,
शिक्षा, रोज़गार हुए शहीद |
वैज्ञानिक गिरवी विदेशों में,
खुले न अपने दीद ||

खुले न अपने दीद,
नेताओं से ख़रीदा चश्मा |
लगा कि कोई अवतार आकर,
करेगा नया करिश्मा ||

कोई देश नहीं होता संपूर्ण,
हमको ही बनाना पड़ता है |
बोझा गर ज़्यादा हो तो,
मिलकर ही उठाना पड़ता है ||

खुद से, घर से, आस पास से,
कुछ कर लें प्रारंभ |
कुछ साफ़ करें, शिक्षा दें किसी को,
अब छोड़ दीजिये दंभ ||

धर्म, जाति के छोड़ें ठेके,
स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार उठावें|
कारखाने और खेत बढ़ावें,
हर हाथ को अब कुछ काम दिलावें ||

कोऊ नृप होए हमें का करना,
बहुत कर ली डिबेट |
बहुत फोड़ लीं आँखें सबने,
अब और न कीजिये वेट |

आज आयो इक शुभ दिन है,
युवक है देश, नए हैं इरादे |
कुछ पहले से बेहतर करेंगे
छोटे से ये खुद से वादे ||

स्वतंत्रता दिवस सबको शुभ हो

– सुनील जी गर्ग
१५ अगस्त, २०१८