हिंदी में मन मिलाते हैं हम

14-Sep-2020

हिंदी को समर्पित एक कविता

हिंदी ही समेटे है हिंदुस्तान
इसी में मन मिलाते हैं हम
मस्तिष्क की कुंजी है ये ही
इसी में सोचकर भुलाते हैं गम

हम थोड़ा कम पढ़ने लगे हों इसको
पर दुनिया में इसको सीखने की चाह
इतना साहित्य भरा पड़ा है इसमें
और फिल्में इसमें तो बस भई वाह

इसका संगीत से भी है पुराना नाता
इसमें लिखे गाने है बच्चा बच्चा गाता
कविता की तुक इसमें अच्छी है मिलती
प्रेमी छेड़े राग तो प्रेयसी को भाता

पर जब इसका दिवस मनाते हैं
तो जरा मन को कुछ अखरता है
दैनिक काम का इक दिवस कैसा
प्रश्न ये खुद से दिल करता है

ठीक है माँ के जन्मदिन की तरह
ये आज का दिन भी लेते हैं मना
हर मौलिक विचार की जननी है यही
जीवन का हर पहलू इसी से है बना

हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई

– सुनील जी गर्ग

डबल मैंगो मैजिक कुल्फी

04-Jul-2020

सामग्री : (4 व्यक्तियों के लिए )

2 मध्यम साइज दशहरी आम
1 मध्यम साइज चौसा आम
2 बड़े चम्मच मलाई
200 ग्राम कंडेंस्ड मिल्क (मिल्कमेड/मिठाईमेट इत्यादि)
10 कटे हुए बादाम
10 -15 केसर के रेशे
4 आइसक्रीम वेफर या स्टिक
4 छोटी सूखी चेरी (सजावट के लिए )

विधि:
– दशहरी आम छील कर छोटे टुकड़े कर लें.
– मिक्सर में आम के छोटे टुकड़े, मलाई, कंडेंस्ड मिल्क एक साथ डाल दें.
– थोड़ा मिक्स करें, फिर मिक्स को चम्मच से चलायें।
– ऐसा आठ दस बार करें जब तक फाइन पेस्ट न बन जाये।
– इस मिक्स को निकलकर एक उचित साइज के बर्तन में कर लें.
– बर्तन को ऊपर से एल्युमीनियम फॉयल से कवर कर दें.
– अब फ्रीज़र में लगभग २ घंटे के लिए रख दें. फ्रिज मध्यम मोड में हो.
– दो घंटे बाद निकाल कर एक कलछी से धीरे धीरे मिक्स कर दें.
– कलछी को उल्ट सीधा न चलायें। कम स्पीड से मिक्स करें।
हवा के बुलबुले न बनने दें.
– इस मिक्सचर में चौसा आम के छोटे टुकड़े, बारीक कटे बादाम,
केसर के रेशे मिलाएँ।
– कलछी से धीरे से चला कर पूरे मिश्रण में सब टुकड़ों को इकसार पहुंचा दें.
– अब बर्तन को पुनः एल्युमीनियम फॉयल से कवर कर दें और फ्रीज़र में रख दें.
– इस बार लगभग आठ से दस घंटे तक जमने दें. ये गाढ़ा स्मूथ मिक्सचर है.
इसे जमने में वक़्त लगेगा।
– फ्रीज़र से निकालकर प्यालियों में डालें, कटे बादाम, चेरी और वेफर से सजायें।
– खाने के लिए तुरंत दें. थोड़ा हिस्सा बचा के ज़रूर रखें,
– सभी इसको दोबारा अवश्य मागेंगे।

(c) 2020 – mishtaanmitra

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जाने किस बात की टीस

23-Jun-2020

मोर्चे कई खोलने पड़ते जब, विचारों की लड़ाई हो विचारों से
रिश्तों में क्या देखें जीत क्या देखें हार, इन झूठे सच्चे यारों से

नया सोचना होता है, विचारों की भी एक टीम बनानी होती है
इनका का भी एक व्यापार सा होता है, कमाई दिखानी होती है

लम्बी चला करती हैं ऐसी लड़ाइयां, कई पुश्तें लग जाती हैं
हारने की आदत भी होती है सीखनी, जीतें तभी सुहाती हैं

हर कोई सोचता तो है, बस हमसे सिरफिरे लिखते हैं इन बातों को
अब कागज पे नहीं उकेरते, कीबोर्ड पर ठक ठक करते हैं रातों को

मेरे लिए ये बातें हैं गंभीर, आपके लिए कैसी होंगी पता नहीं
कुछ बातें निकली हैं दिल से, कुछ नहीं, वैसे मेरी कोई खता नहीं

हम बेहतर हैं उनसे, हम सोचते हैं, वो भी तो यही सोचते होंगे
रिश्ता आगे चलायें या न चलायें, वो भी तो जरूर तौलते होंगे

बस यूं ही दिल की टीस किसी को न दिखाने की है आदत
आजकल बदला सा है माहौल, बदल गया है लफ्ज़-ए-चाहत

– सुनील जी गर्ग

मेरे पिता और मैं पिता (एक परिवर्तन)

21-Jun-2020

मेरे लिए आप एक दिवस नहीं
बस पूरे हर दिन हर साल थे
मालूम न था इतनी जल्दी जाओगे
आप गए तो अपने बुरे हाल थे

फिर संभले, ख़ुद भी बने बाप
फादर का दिन मनाने लगे बच्चे
एक दिन ही मिलने लगा हमको
रिश्ते क्यों पड़ते हैं अब थोड़े कच्चे

वो जो आप किया करते थे
हम भी तो कुछ वैसा ही करते हैं
ये दिन मनाने की अजब चली बयार
आज बच्चे नहीं, पिता बच्चों से डरते हैं

आपकी, अम्मा की तस्वीर लगी है
रोज बिना नागा नमन कर लेता हूँ
अपनी तो दीवार पर नहीं लगेगी
इंटरनेट पर रहेगी, सब्र कर लेता हूँ

पर हाँ एक बात है, बतला देता हूँ
आप आज के दिन कुछ ज़्यादा आते हो याद
बुरी नहीं ये पितृ दिवस की प्रथा
आज शायद मेरे बच्चे देंगे मेरी कविताओं को दाद

अपनी ही बुलेट बनानी होगी

18-Jun-2020

अब खून नहीं खौलता किसी का,
आदत अपनी है सुविधाभोगी
सीमा पर जाबाँज गँवाकर
बात करें, ज्यों पहुंचे जोगी

वो कवि प्रदीप अब नहीं रहे
ऐ मेरे वतन जो लिख के गए
दिनकर को अब ढूंढो मत
जो समर शेष बतला के गए

लता दीदी जब बच्ची थीं जब
पी.एम्. की आँखें हुईं नम
आज कौन वो भाव भरेगा
हर मैं को बनाएगा वो हम

कौन कौन सा टी. वी. तोडूं
किसका मैं मोबाइल पटक दूँ
चीन घुसा कतरे कतरे में
चाहे जो सामान झटक दूँ

हम गलती हैं नहीं मानते
हर बात का है कोई बहाना
पढ़ना लिखना भूल गए हम
विश्व गुरु जो खुद को माना

ऐसे में हिल जाती बिलकुल
कवि की लेखनी भी है बहकती
हल जब कोई सुझाई न देता
अंगारों सम आग बरसती

हमसे ही वरदान ये पाकर
बने ये देश हैं भस्मासुर
तस्वीर तभी सकती है बदल
जब हर बच्चा हो रण बाँकुर

आत्म निर्भरता तभी भली जब
आत्म सशक्तता हो पूरी
वक़्त को ठीक सकें पहचान
छोड़ सकें हर मजबूरी

हममें गुस्सा है या ढोंग है
सही फैसला करना होगा
आत्म सम्मान बचाकर पूरा
परिस्थिति से उबरना होगा

बदले की आग रखकर जलाये
चतुराई दिखलानी होगी
दुनिया को संग लेना होगा
सच्चाई बतलानी होगी

यू.एन.ओ. अब फिर से बनाओ
सब नियम पुराने बदलवाओ
हर छठा बच्चा है भारत का
दुनिया को ताक़त दिखलाओ

नयी कलम से नयी इबारत,
नयी आदतें लानी होंगी
थोड़ा सा त्याग, ज़्यादा सी मेहनत
अपनी ही बुलेट बनानी होगी

– सुनील जी गर्ग

यूं पत्तों के पीछे से झांककर

14-Jun-2020

यूं पत्तों के पीछे से झांककर क्यूँ देखा करती हैं आप
आप ही के लिए तो हम बागों के चक्कर लगाते हैं
आप समझती हैं कि हमको कुछ पता ही नहीं है
हम लखनऊ के नवाब यूं ही नहीं फाख्ता उड़ाते हैं

हर बार वही झील सी हरी नीली दिखती है आपकी आँख
आप पूरी कैसी होंगी, रोज़ ख्वाबों में देख देखकर थक गए
कैसी सचमुच में दिखती होंगी आप बला की बाला
बखान करते करते कलम और कलाम दोनों घिस गए

वैसे रिश्ते जल्दी ही कायम कर लेती है आपकी एक नज़र
ये लीफ ग्रीन कलर का साथ बड़ा सूट करता है आपको
ये पत्तियों की धारियां, लगती हैं जैसे आपकी अंगड़ाइयाँ
आपका बार बार अक्सर यूं निहारना लूट लेता है मुझको

आज ही पत्तों के पीछे से निकलकर मुखड़ा दिखा देना
मेरे घर वाले मुझ पर कुछ शक सा करने लगे हैं जाहिर
हाँ वैसे मैं कविता शेर वगैरह लिख लिया करता हूँ थोड़ा
पर मोहब्बत करने में बता दूँ, और भी ज़्यादा हूँ माहिर