2020 Shikha B’Day Zoom Event and Thanks Note

09-Jun-2020

Invite Note:

किसी स्त्री के जीवनकाल में १६, २५, ४० और ५० जैसे वर्षों का विशेष महत्व होता है,

ऐसा माना जाता है कि स्त्री की आयु 16 के बाद 25 फिर 40 और फिर 50 पर आकर ठहर जाती है, मेरी धर्मपत्नी शिखा इन सुन्दर आयु चरणों के सुनहरे पड़ाव पर कल 9 जून को दाखिल होंगी, इस विशेष उपलक्ष्य पर ज़ूम पर दो कार्यक्रम आयोजित किये गए हैं.

शाम 7 से 8 – सत्यनारायण कथा
शाम 8 के बाद – केक और गेम कार्यक्रम

आप सब सादर आमंत्रित हैं

सुनील जी गर्ग

नोट: कार्यक्रम के इनविटेशन लिंक संलग्न हैं.

Thanks Note:
हम ‘शांति निलयम’ लखनऊ के निवासी आप सभी लोगों का कल के डिजिटल जन्मदिन समारोह में उत्साह पूर्वक उपस्थिति और मनोरंजक कार्यक्रम प्रस्तुतियों के लिए हृदय से आभार व्यक्त करते हैं | कितनी चमत्कारिक बात है कि ईश्वर सबको इस विपदा की परिस्थिति में भी पास आने के साधन उपलब्ध करा रहा है| आशा है कि ये मुश्किल समय भी शीघ्र गुजरेगा और हम सब पहले से भी अधिक गर्मजोशी से साक्षात् भी मिल सकेंगे। स्वस्थ रहें , सुरक्षित रहें, सजग रहें पर संपर्क में अवश्य रहें |

पर्यावरण दिवस २०२०

05-Jun-2020

पर्यावरण दिवस की शुभकामनायों के साथ प्रस्तुत हैं ये चंद पंक्तियाँ

कह लो इसको प्रकृति
या कह लो पर्यावरण
पर ध्यान ज़रा सा रख लो बंधु
रोक लो इसका शीघ्र क्षरण 

जल, जंगल, ज़मीन का दोहन
नहीं रोका तो तय है विनाश
फिर बाद में यूँ कहते फिरोगे
समय रहते कुछ किया होता काश

अभी हाल की घटनाओं ने 
काफी कुछ तो सिखलाया है
प्रकृति ही असली माँ है हमारी
यही सभी को बतलाया है 

वही इसी को देना होगा
जो माँ को तुम देते सम्मान
नहीं ज़रा इक दिवस मनाकर
रोज़ ही रखना होगा ध्यान

पेड़ लगाओ, पानी बचाओ
सब अच्छा है करते रहो
रखरखाव पर सबसे ज़रूरी
घट इक ये भी तो भरते रहो

थोड़ी सी इससे लग तो लगा लो
ये प्रेम बढ़ाता है पर्यावरण
प्रकृति फिर निखरकर आती
सारे अपने उतारकर आवरण

सुनील जी गर्ग

बेअसर कमेरे, बेहतर कवि

01-Jun-2020

कवि को बस तारीफ चाहिए
आधा सच ये आधा झूठ
कोई कमेंट न मिलता उसको
इतनी जल्दी जाए न रूठ

कविता क्या बस तुकबंदी है
भाव वगैरह समझ है अपनी
सबके दायरे अपने अपने
सबको अपनी माला जपनी

हाँ पर हिलते कभी दिलों के
तार किसी के शब्दों से
पत्थर दिल जाते हैं पिघल
गरम खौलते कुछ लफ़्ज़ों से

पर कवि कहलाना इज़्ज़त है
या ठलुआपन की निशानी है
ढूंढ रहे सब इसका उत्तर
ये बात अभी अनजानी है ।

कुछ कवियों ने बदले इतिहास
यही सोच सब लिखते हैं
हमें तो अपनी पता है सीमा
लिखते हैं, कि आपसे रिश्ते हैं ।

कुछ करते हों या न करते हों
कवि रिश्ते तो निभाते हैं बेहतर
इनकी भी ज़रुरत है दुनिया को
जब कमेरे हो चले हों बेअसर ।

सुनील जी गर्ग

सब ख्याल रखना

31-May-2020

खा खा कर अब बोर हो गए
घर का समोसा, इडली, डोसा
खस्ता कचौरी मिली न कबसे
मुए कोरोना को रोज ही कोसा

कमर नहीं थी ऐसी लचक की
रोज लगा सके झाड़ू पोंछा
हाथ बटाएंगे वादा था हाँ
रोज की आफत किसने सोचा

मीट, टीम, और ज़ूम के रिश्ते
कब तक करेंगे हम ये दिखावा
व्हाट्सप्प भी जान को आ गया
अब अँगुलियों का दर्द न जावा

फेसबुक तो दुश्मन पहले से
मेरी प्लेट और गरम रोटी के बीच
इंस्टाग्राम अब नया ये दानव
कितनी डल गयीं सेल्फी खींच

अनलॉक की खबर अब आयी है
हलवाई समझो जुबां तक आ गया
बीमारी फिमारी सब अपनी जगह है
इसका मन से डर तो चला गया

पर वैसे ये सब मज़ाक तक ठीक है
ज़िन्दगी मज़ाक न करे, इसीलिए सम्हलना
बड़ा अच्छा लिखते थे ये चल पड़े फिर बाद में,
मैं भी रखूँगा ख्याल, आप भी अपना रखना ||

– सुनील जी गर्ग

इतिहास सब कुछ कर लेता है नोट

21-May-2020

कल न्यूज़ देखकर कुछ लिख डाला, सोचा आप सबसे शेयर करूं

फैलता जा रहा है, फैलता जा रहा है
मैं वायरस नहीं, रायते की कर रहा हूँ बात
तेज हो रही है, रफ़्तार तेज़ हो रही है
मैं तूफ़ान की नहीं, बता रहा हूँ राजनैतिक हालात।।

जैसी हुई यहाँ पर बसों पर लड़ाई
कल शायद वैक्सीन बांटने पर होगी
इस देश को अभी देखना है बहुत कुछ
महाभारत तो एक कलियुग में भी होगी

कृष्ण और अर्जुन न होंगे पर होगा ढोंग
टेक्नोलॉजी के नाम पर भरेंगे दम सब
असलियत तो सूक्ष्म विषाणु ने दिखा दी
आइना देखने पर भी सुधरे हैं हम कब ।

पर याद रखना कल गाँव से फिर पड़ेगा जुड़ना
वो जो लिखा है ‘हम भारत के लोग’ वहीँ बसेंगे
कितनी भी कर लो बहस, बदल लो संविधान
खाना वहीँ उगेगा, उन पर ही हम निर्भर रहेँगे

लौटते क़दमों का हिसाब शायद भूल जाएँ वो
बदले की भावना नहीं, इसी का हमने लिया फायदा
मगर इतिहास सब कुछ कर लेता है नोट
बतला देगा किसका था कायदा, किसका बेकायदा

सुनील जी गर्ग

अरे कुछ दिन जरा रुका

16-May-2020

ऐतिहासिक श्रमिक निवर्तन पर कुछ पंक्तियाँ एक वार्तालाप के रूप में लिखीं हैं, आशा है आपको कहीं छूएंगी अवश्य |

अरे कुछ दिन जरा रुका
सब ठीक हो जाईल, फिर कमायेंगे
तोहार बात सब ठीक
पर भैया हम तो घर जायेंगे ।

उहाँ का धरा है
बंजर ही तो जमीन पड़ी है
हम तोहार समुझाइ न सकत
मैया बाट जोहती द्वारे खड़ी है ।

अरे। फैक्ट्री खुलन लागी हैं
डबल मिलेगा ओवरटाइम
ओवर फोवर क्या करिबे
जब ई शरीर का आवेगा टाइम

पर भैया पैदल काहे चलिबै
बस चलत है, चालू है टिरेन
इब हमरे खन कछु नहीं
मूढ़ पिरात है, खाओ न बिरेन ।

पर तुम चले जाब तो,
कइसे चलिबा हमरा काम
जोन हम भूखो पड़ो रहे
तब कौन लियो हमरो नाम |

पर भैया अब तो पैकेज आई गवा
तुम्हरे सबे दुःख दूर भवेंगे
हमको कोनो दुःख नाहीं भैया
घर जावेंगे, अब हम वहीँ खटेंगे |

मगर सरकार तो भली है,
सबकी कर रही है पूरी मदत
सरकार सबे भली ही होत हैं,
जबे वोट परिबे, देखिबे वाए बखत |

मगर ओ मुसीबत के मारों
चना, अनाज तो लेत जाबा
जो हमने उगाया, हमें बाँटते हो
गाँव आकर ये सब हमसे लई जाबा |

इधर पइसा ज़्यादा है, सबे है पता
इसी शहर ने तोको इंसान है बनाया
शहर वालों की मुहब्बत के मारे हैं हम
मेहनतकश को काहे भिखारी बनाया |

अब कइसे करोगे जरा समुझाओ
कइसन तोहार दिवस बहुरेंगे
अब तुम आवोगे हमरे गावंन में
उहें मिलकर सबे आतम निर्भर बनेंगे |

सुनील गरगवा जी

(आज मज़दूर की भाषा में भी कई प्रदेशों की आंचलिक भाषा का मिक्स होइ गवा है, इसीलिए इस रचना को कृपया आंचलिक भाषा के स्तर पर त्रुटिपूर्ण मानते हुए माफ़ी देवें)

मुझमें उम्मीद उनसे थोड़ी ज़्यादा है

28-Mar-2020

बैटरी पड़ गयी है मंद, सुस्त हो गयी है घड़ी,
वैसे भी अब वक़्त अब देखना किसको है |
ज़िन्दगी की यही रफ़्तार लगने लगी है अच्छी,
कौन मुझसे आगे दौड़ेगा देखना मुझको है ||

दौड़े दौड़े से भागे से आगे फिरते थे मुझसे वो,
मेरा मज़ाक बनाने में मज़ा आता था उनको |
आज मेरी ज़िन्दगी से रश्क़ करते थमते नहीं,
वक़्त की करवट का पहले न पता था उनको ||

वैसे ग़म और ख़ुशी का भेद भूलते जा रहे हैं वो भी,
खुद को सन्यासी बताने में अब गुरेज नहीं |
मगर मुझमें उम्मीद उनसे थोड़ी ज़्यादा है ,
ये पक्का है, बाहर की रौशनी भीतर से तेज नहीं ||

सजा सबको बराबर मिलेगी, नियति का यही है फ़ैसला,
मगर अलग अलग है सबकी सहने की शक्ति |
क़ुसूर किसके ज़्यादा हैं किसके हैं दूसरे से कम,
फैसले से फ़रक न पड़े शायद, अब हो गयी विरक्ति ||

कोरो ना आशिकी

19-Mar-2020

आजकल जो शब्द चल रहे हैं उनको मिला कर ये रचना बना ली। सावधानियां भी इसमें शामिल हैं।

अच्छे लगने लगे उनको वो आशिक़,
हाथ धोकर थे जो पीछे पड़े ।
दरअसल जाने अनजाने वो लोग
कोरोना वायरस से बेहतर थे लड़े ।।

पीछे पड़ो मगर मीटर की दूरी बना कर रखो,
कन्या ने साफ़ कह दिया उन सबसे।
क्वारंटाइन में रहेंगे तो मेसेज से बात कर लेना,
सरकारी मेहमान बनने की तम्मना थी कबसे

इधर साबुन में शराब मिला मिला कर,
सेनेटाईज़र भी आशिक़ ने बना लिया।
उधर माशूक का दिल बदला तो यूं ही,
छींक कर सोशल डिस्टेंस बना लिया।

सोचा थोड़ा मुस्कान दूं सबको तो
यूं ही लिख दिया जरा नए अंदाज़ में।
ईश्वर करे न मिलना पड़े किसी ऐसे से,
जो इधर जल्दी ही लौटा हो जहाज में।।

सुनील जी गर्ग