यूं पत्तों के पीछे से झांककर

June 14, 2020

यूं पत्तों के पीछे से झांककर क्यूँ देखा करती हैं आपआप ही के लिए तो हम बागों के चक्कर लगाते हैंआप समझती हैं कि हमको कुछ पता ही नहीं हैहम लखनऊ के नवाब यूं ही नहीं फाख्ता उड़ाते हैं हर बार वही झील सी हरी नीली दिखती है आपकी आँखआप पूरी कैसी होंगी, रोज़ ख्वाबों […]

हम तले

March 13, 2020

मेरे पास आकर यूं बुदबुदाया न करो, पहले बम फोड़ती थीं वही दिन थे भले। मुकाबले की ज़ानिब तैयार तो रहा करते थे, अब तो तुम ऊपर ही ऊपर रहती हो और हम तले।।

नज़दीकियां सारी मैं हूँ

February 7, 2020

साथ चलती हो तो साथ बैठा भी करो, साथ साथ रहना लगता है अच्छा । साथ रहने से उपजी लड़ाई हुई अब कल की बात, झूठ अब झूठ न रहा हो चुका है सच्चा ।। तुम जब उबलती हो तब भी, शांत होती हो तब भी, लगता है वजह हर अदा की तुम्हारी मैं हूँ […]

उम्र और दूरी

January 11, 2020

चाहत, तम्मन्ना, मोहब्बत, अभी छूटी कहाँ है आदत | चखी नहीं है मदिरा कभी, क्योंकि आप जो हैं इतने मादक || हमें लिखने में करने में, दोनों में आती है शरम | मगर आपको आती होगी, ये निकला हमारा भरम || सारे सच झूठ की सीमायें , यहीं पर शुरू, यहीं पर ख़तम | जी […]