नववर्ष के अनेक रूप


मेरे एक मित्र ने मुझे १ जनवरी को नववर्ष शुभ कहने पर एक बैनर भेजा जिसमें लिखा था कि हमारा नववर्ष तो चैत्र प्रतिपदा पर आयेगा, तब मैंने जवाब में ये लिखा |

आदरणीय सर!

आज आपका ये बैनर फिर आया तो मैंने सोचा नववर्ष पर व्हाट्सप्प से फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास करूँ. दरअसल नववर्ष के अनेक रूप हैं और हम समावेशी संस्कृति होने के कारण सबको प्रसन्नता के साथ सम्मान देते हैं| भारत सरकार ग्रेगोरियन कैलेंडर को ऑफिशिअल मान्यता देती है और इसके साथ प्रांतों के अनुसार शक सम्वत या सूर्य आधारित कैलेंडर के अनुसार सब अपनी अपनी संस्कृतियों के अनुरूप नव वर्ष व् अन्य तिथियों पर त्यौहार मानते हैं |

हम अपने सभी अंगों के नव वर्ष पर खुश हो सकते हैं| जिस तिथि को हम हर रोज प्रयोग करते हैं, उसके वर्ष बदलने पर हम एक नयापन महसूस करते हैं और एक नयी ऊर्जा के संचार के मौके के रूप में देखते हैं| ऐसे मौके हम मिलकर वर्ष में अनेक बार भी ला सकते हैं, क्योंकि हम सब बंधु बांधव हैं और “वसुधैव कुटुम्बकम” सिर्फ एक वाक्य नहीं हमारी संस्कृति की जीवन शैली है.

भारत में प्रचलित अन्य नववर्ष इस प्रकार हैं |

शालिवाहन शक सम्वत – चैत्र प्रतिपदा
पुथांडु (तमिल) – 14 अप्रैल
बोहग बिहु (असम) – 13 -15 अप्रैल
पोहेलाबैसाख (बंगाल) – 14 – अप्रैल
वेस्तु वरस (गुजरात) – दिवाली के अगले दिन
विशु (मलयालम) – 14 अप्रैल
लोसांग (सिक्किम) – दिसंबर
चेती चाँद (सिंधी) – चैत्र द्वितीया
बैसाखी (पंजाब) – 14 अप्रैल

आशा है आप मेरी बात में इंगित मर्म को जान पाए होंगे |

नव वर्ष की पुनः शुभकामनाओं के साथ,

सुनील जी गर्ग

नोट:
उपरोक्त वाक्य मैंने स्वयं लिखें हैं, किसी अन्य के विचार नहीं प्रस्तुत किये हैं. अगर मुझसे कोई त्रुटि हुई हो तो अनुज समझ कर क्षमा कीजियेगा |


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