बेअसर कमेरे, बेहतर कवि


कवि को बस तारीफ चाहिए
आधा सच ये आधा झूठ
कोई कमेंट न मिलता उसको
इतनी जल्दी जाए न रूठ

कविता क्या बस तुकबंदी है
भाव वगैरह समझ है अपनी
सबके दायरे अपने अपने
सबको अपनी माला जपनी

हाँ पर हिलते कभी दिलों के
तार किसी के शब्दों से
पत्थर दिल जाते हैं पिघल
गरम खौलते कुछ लफ़्ज़ों से

पर कवि कहलाना इज़्ज़त है
या ठलुआपन की निशानी है
ढूंढ रहे सब इसका उत्तर
ये बात अभी अनजानी है ।

कुछ कवियों ने बदले इतिहास
यही सोच सब लिखते हैं
हमें तो अपनी पता है सीमा
लिखते हैं, कि आपसे रिश्ते हैं ।

कुछ करते हों या न करते हों
कवि रिश्ते तो निभाते हैं बेहतर
इनकी भी ज़रुरत है दुनिया को
जब कमेरे हो चले हों बेअसर ।

सुनील जी गर्ग


http://indyan.com/?p=370701-Jun-2020