यूं पत्तों के पीछे से झांककर


यूं पत्तों के पीछे से झांककर क्यूँ देखा करती हैं आप
आप ही के लिए तो हम बागों के चक्कर लगाते हैं
आप समझती हैं कि हमको कुछ पता ही नहीं है
हम लखनऊ के नवाब यूं ही नहीं फाख्ता उड़ाते हैं

हर बार वही झील सी हरी नीली दिखती है आपकी आँख
आप पूरी कैसी होंगी, रोज़ ख्वाबों में देख देखकर थक गए
कैसी सचमुच में दिखती होंगी आप बला की बाला
बखान करते करते कलम और कलाम दोनों घिस गए

वैसे रिश्ते जल्दी ही कायम कर लेती है आपकी एक नज़र
ये लीफ ग्रीन कलर का साथ बड़ा सूट करता है आपको
ये पत्तियों की धारियां, लगती हैं जैसे आपकी अंगड़ाइयाँ
आपका बार बार अक्सर यूं निहारना लूट लेता है मुझको

आज ही पत्तों के पीछे से निकलकर मुखड़ा दिखा देना
मेरे घर वाले मुझ पर कुछ शक सा करने लगे हैं जाहिर
हाँ वैसे मैं कविता शेर वगैरह लिख लिया करता हूँ थोड़ा
पर मोहब्बत करने में बता दूँ, और भी ज़्यादा हूँ माहिर

 


http://indyan.com/?p=372114-Jun-2020