अपने जन्मदिवस पर (2015)


October 18, 2015 | poems-wishes

हर जनम दिवस सोचूं मैं,

कुछ नया करूंगा इस बार जरूर,

पर मेरे नये को लोग मानते हैं मेरा एक जगह न टिकना,

बताओ क्या जवाब दूं हुज़ूर

ऐसे ही नया करने की आदत रिश्तों के नए प्रयोग करने को कहती है.

क्योंकि वो मिल ही जाते हैं कुछ मजबूर कुछ मगरूर

मजाक करना तो मुझे कभी आया ही नहीं ,

क्योंकि अपना मजाक बनता ही रहा है बिना कोई कसूर

कौन सी हद तोड़ दी हमने,

कोई हमें बताता भी तो नहीं कि हम उनके पास हैं कि दूर

गर मन के राजा हैं हम तो आइए पूरा राज पाट ले लीजिये हमारा,

जाईए पूरा निछावर करते हैं हम अपना नूर

अब पूछकर, बताकर फायदा भी क्या ,

किसी पे किसी चीज़ का, किसी और पे किसी का चढ़ा ही रहता है सुरूर .

खैर साहेब, वक़्त की हर शह की गुलामी, सबको पड़ेगी निभानी,

गोंद लिए बैठे रहेंगे सलाखों के पीछे, आज कर लो कितना ही चूर.

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